​*साक्षी मलिक और संधु को समर्पित*

हुआ कुम्भ खेलों का आधा, हाथ अभी तक खाली थे।
औरों की ही जीत देख हम, पीट रहे क्यों ताली थे।
सवा अरब की भीड़ यहाँ पर, गर्दन नीचे डाले थी।

टूटी फूटी आशा अपनी, मानो भाग्य हवाले थी।
मक्खी तक जो मार न सकते, वे उपदेश सुनाते थे।

जूझ रहे थे उधर खिलाड़ी, लोग मज़ाक उड़ाते थे।
कोई कहता था भारत ने , नाम डुबाया खेलों में।

कोई कहता धन मत फूंको, ऐसे किसी झमेलों में।
कोई कहता मात्र घूमने, गए खिलाड़ी देखो तो।

कोई कहता भारत की है, पंचर गाड़ी देखो तो।
बस क्रिकेट के सिवा न जिनको , नाम पता होगा दूजा।

और वर्ष भर करते हैं जो, बस क्रिकेट की ही पूजा।
चार साल के बाद उन्हें फिर नाक कटी सी लगती है।

पदक तालिका देख देख कर, शान घटी सी लगती है।
आज देश की बालाओं ने , ताला जड़ा सवालों पर।

कस के थप्पड़ मार दिया है, उन लोगों के गालों पर।
बता दिया है जब तक बेटी ,इस भारत की जिंदा हैं।

यह मत कहना भारत वालो, हम खुद पर शर्मिंदा हैं।
शीश नहीं झुकने हम देंगी, हम भारत की बेटी हैं।

आन बान की खातिर तो हम, अंगारों पर लेटी हैं।
भूल गए यह कैसे रक्षा-बंधन आने वाला है।

बहिनों के मन में पावन, उत्साह जगाने वाला है।
भैया रहें उदास भला फिर, कैसे राखी भाती ये।

पदकों के सूखे में पावस, कैसे भला सुहाती ये।
दो दो पदकों की यह राखी, बाँधी, देश कलाई पर।

इतना तो अहसान सदा ही, करती बहिना भाई पर।
आज साक्षी के भुजदंडों, ने सबको ललकारा है।

अगर हौसला दिल में है तो, पूरा विश्व हमारा है।
पीवी संधू के तेवर हैं,  जैसे लक्ष्मीबाई हो।

अपनी भाई की खातिर ज्यों , बहिन युद्ध में आई हो।
जिनको अबला कहा वही तो ,सबला बन छा जातीं हैं।

अपने मन में ठान लिया वह, पूरा कर दिखलाती हैं।

Source: unknown.

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